उद्धव–राज हुए एकजुट मीरा-भाईंदर में महायुति पर सस्पेंस!
महाराष्ट्र में निकाय चुनाव की तारीखे आने के बाद सियासी उथल-पुथल सी हो गईं हैं Iमहाराष्ट्र में नगरपालिका चुनावों की घोषणा हो चुकी हैं , लेकिन मीरा-भाईंदर में महायुति के दलों के बीच गठबंधन को लेकर अब भी असमंजस बना हुआ है। 95 सदस्यीय नगर निगम में भाजपा ने 70 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है, वहीं शिंदे गुट की शिवसेना 50-50 के फॉर्मूले के तहत करीब 47 सीटों की मांग कर रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच सीटों का तालमेल कैसे बनेगा, यह बड़ा सवाल है।
गौर करने वाली बात यह है कि, 2017 के पिछले चुनावों में भाजपा को 61, अविभाजित शिवसेना को 22 और कांग्रेस को 12 सीटें मिली थीं। फिलहाल मीरा-भाईंदर में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना भी लगातार अपना जनाधार बढ़ा रही है।
95 सीटों के लिए भाजपा की ओर से अब तक करीब 400 दावेदार सामने आ चुके हैं, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना के पास भी सैकड़ों इच्छुक उम्मीदवारों की सूची तैयार है। यदि दोनों दलों के बीच गठबंधन होता है, तो 500 से अधिक दावेदारों के असंतुष्ट होने की आशंका है। यह नाराजगी आगे चलकर बगावत का रूप भी ले सकती है। ऐसे में दोनों दलों के सामने गठबंधन कायम रखने के साथ-साथ अंदर उठने वाली मतभेद को संभालना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
भाजपा द्वारा अपने प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती !
विधायक नरेंद्र मेहता के नेतृत्व में भाजपा ने 2017 के मनपा चुनावों में 61 सीटें जीती थीं। हालांकि, इस बार वही ताकत पार्टी के लिए चुनौती भी बन सकती है।95 सीटों के लिए 400 से अधिक दावेदारों की बढ़ती संख्या ने बगावत की संभावनाओं को बढ़ा दिया है। ऐसे में पार्टी को असंतुष्ट दावेदारों से होने वाले नुकसान के साथ-साथ अपने पुराने प्रदर्शन को बनाए रखने का दबाव भी झेलना पड़ेगा।
निर्दलीय उम्मीदवार में हो सकती है बदलाव राजनीतिक समीकरण!
मनपा के चुनाव लगभग नौ साल बाद हो रहे हैं, इसलिए इस बार का चुनावी माहौल काफी रोमांचक है। टिकट पाने की प्रतियोगिता तेज हो गईं है I और हर पार्टी में उम्मीदवारों की संख्या बढ़ गई है। लेकिन पार्टियों के अंदर की राजनीति और गठबंधन की मजबूरियां कईं दावेदारों को निराश कर सकती हैं। टिकट न मिलने पर कईं नेता और कार्यकर्ता निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ सकते हैं। इससे सीधे तौर पर पार्टियों के पारंपरिक वोटों पर असर पड़ने की संभावना है। यदि कईं निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं, तो मुकाबला सिर्फ त्रिभुजी ही नहीं होगा, बल्कि बड़े दलों के चुनावी गणित को भी चुनौती मिल सकती है।
शिवसेना के लिए सीटें बढ़ाने का मौका I
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के नेतृत्व में शिवसेना (अविभाजित) ने पिछले चुनावों में 22 सीटें जीती थीं। इस दौरान सरनाईक के नेतृत्व में शिंदे सेना का जनाधार और ताकत लगातार बढ़ी है। अब पार्टी के लिए अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने का अच्छा मौका है और सरनाईक इसे किसी भी कीमत पर हाथ से जाने नहीं देंगे।
कांग्रेस के लिए मौके की संभावना !
अगर आघाड़ी की बात करें तो कांग्रेस के अलावा उद्धव सेना और एनसीपी (SP) संगठन और कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रही हैं। पिछले चुनावों में कांग्रेस के पास 12 सीटें थीं, लेकिन इस बार पार्टी का एक वॉर्ड असुरक्षित है। अगर महायुति गठबंधन में असमानता होता है, तो कांग्रेस के लिए कुछ मौके खुल सकते हैं। वर्तमान में कांग्रेस चुनौती और अवसर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।